श्री गणेश

मंत्र

श्री गणेश

मंत्र

  • आरती संग्रह

गणपति अथर्वशीर्ष

ॐ नमस्ते गणपतये।

त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि।।

त्वमेव केवलं कर्त्ताऽसि।

त्वमेव केवलं धर्तासि।।

त्वमेव केवलं हर्ताऽसि।

त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।।

त्वं साक्षादत्मासि नित्यम्।

ऋतं वच्मि।। सत्यं वच्मि।।

अव त्वं मां।। अव वक्तारं।।

अव श्रोतारं। अवदातारं।।

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  • आरती संग्रह

श्री गणेश पंच रत्न स्तोत्र

मुदा करात्त मोदकं सदा विमुक्ति साधकम् । कलाधरावतंसकं विलासिलोक रक्षकम् । अनायकैक नायकं विनाशितेभ दैत्यकम् । नताशुभाशु नाशकं नमामि तं विनायकम् ॥ 1 ॥

नतेतराति भीकरं नवोदितार्क भास्वरम् । नमत्सुरारि निर्जरं नत

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  • आरती संग्रह

वक्र तुंड महाकाय, सूर्य कोटि समप्रभ:। निर्विघ्नं कुरु मे देव शुभ कार्येषु सर्वदा ॥

भावार्थ : हे हाथी के जैसे विशालकाय जिसका तेज सूर्य की सहस्त्र किरणों के समान हैं । बिना विघ्न के मेरा कार्य पूर्ण हो और सदा ही मेरे लिए शुभ हो ऐसी कामना करते है ।

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  • आरती संग्रह

नमामि देवं सकलार्थदं तं सुवर्णवर्णं भुजगोपवीतम्ं। गजाननं भास्करमेकदन्तं लम्बोदरं वारिभावसनं च॥

भावार्थ : मैं उन भगवान् गजानन की वन्दना करता हूँ, जो समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाले हैं, सुवर्ण तथा सूर्य के समान देदीप्यमान कान्ति से चमक रहे हैं, सर्पका यज्ञोपवीत धारण करते हैं, एकदन्त हैं, लम्बोदर हैं तथा कमल के आसनपर विराजमान हैं ।

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  • आरती संग्रह

एकदन्तं महाकायं लम्बोदरगजाननम्ं। विध्ननाशकरं देवं हेरम्बं प्रणमाम्यहम्॥

भावार्थ : जो एक दाँत से सुशोभित हैं, विशाल शरीरवाले हैं, लम्बोदर हैं, गजानन हैं तथा जो विघ्नोंके विनाशकर्ता हैं, मैं उन दिव्य भगवान् हेरम्बको प्रणाम करता हूँ ।

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  • आरती संग्रह

विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धितायं। नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥

भावार्थ : विघ्नेश्वर, वर देनेवाले, देवताओं को प्रिय, लम्बोदर, कलाओंसे परिपूर्ण, जगत् का हित करनेवाले, गजके समान मुखवाले और वेद तथा यज्ञ से विभूषित पार्वतीपुत्र को नमस्कार है ; हे गणनाथ ! आपको नमस्कार है ।

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  • आरती संग्रह

द्वविमौ ग्रसते भूमिः सर्पो बिलशयानिवं। राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम्॥

भावार्थ : जिस प्रकार बिल में रहने वाले मेढक, चूहे आदि जीवों को सर्प खा जाता है, उसी प्रकार शत्रु का विरोध न करने वाले राजा और परदेस गमन से डरने वाले ब्राह्मण को यह समय खा जाता है ।

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  • आरती संग्रह

गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारु भक्षणम्ं। उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्॥

भावार्थ : जो हाथी के समान मुख वाले हैं, भूतगणादिसे सदा सेवित रहते हैं, कैथ तथा जामुन फल जिनके लिए प्रिय भोज्य हैं, पार्वती के पुत्र हैं तथा जो प्राणियों के शोक का विनाश करनेवाले हैं, उन विघ्नेश्वर के चरणकमलों में नमस्कार करता हुँ।

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  • आरती संग्रह

रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष रक्ष त्रैलोक्यरक्षकं। भक्तानामभयं कर्ता त्राता भव भवार्णवात्॥

भावार्थ : हे गणाध्यक्ष रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिये । हे तीनों लोकों के रक्षक! रक्षा कीजिए; आप भक्तों को अभय प्रदान करनेवाले हैं, भवसागर से मेरी रक्षा कीजिये ।

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  • आरती संग्रह

केयूरिणं हारकिरीटजुष्टं चतुर्भुजं पाशवराभयानिं। सृणिं वहन्तं गणपं त्रिनेत्रं सचामरस्त्रीयुगलेन युक्तम्॥

भावार्थ : मैं उन भगवान् गणपतिकी वन्दना करता हूँ जो केयूर-हार-किरीट आदि आभूषणों से सुसज्जित हैं, चतुर्भुज हैं और अपने चार हाथों में पाशा अंकुश-वर और अभय मुद्रा को धारण करते हैं, जो तीन नेत्रों वाले हैं, जिन्हें दो स्त्रियाँ चँवर डुलाती रहती हैं ।

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  • आरती संग्रह

मंत्र पुष्पांजली

ॐ यज्ञेन यज्ञमयजंत देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्| ते हं नाकं महिमान: सचंत यत्र पूर्वे साध्या: संति देवा: ॐ राजाधिराजाय प्रसह्ये साहिने| नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे स मे कामान्कामकामाय मह्यम्| कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु| कुबेराय वैश्रवणाय | महाराजाय नम: ॐ स्वस्ति साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं पारमेष्ठ्यं राज्यं माहाराज्यमाधिपत्यमयं समंतपर्यायी स्यात्सार्वभौम: सार्वायुष आंतादापरार्धात्पृथिव्यै समुद्रपर्यंता या एकराळिति तदप्येष श्लोकोऽभिगीतो मरुत: परिवेष्टार

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  • आरती संग्रह

श्री सिद्धि विनायक नामावलि

||श्री सिद्धि विनायक नामावलि || ॐ विनायकाय नमः | ॐ विघ्नराजाय नमः | ॐ गौरीपुत्राय नमः | ॐ गणेश्वराय नमः | ॐ स्कन्दाग्रजाय नमः | ॐ अव्ययाय नमः | ॐ पूताय नमः | ॐ दक्षाध्यक्ष्याय नमः | ॐ द्विजप्रियाय नमः | ॐ अग्निगर्भच्छिदे नमः | ॐ इंद्रश्रीप्रदाय नमः | ॐ वाणीबलप्रदाय नमः | ॐ सर्वसिद्धिप्रदायकाय नमः | ॐ शर्वतनयाय नमः | ॐ गौरीतनूजाय नमः | ॐ शर्वरीप्रियाय नमः | ॐ सर्वात्मकाय नमः | ॐ सृष्टिकर्त्रे नमः | ॐ देवानीकार्चिताय नमः | ॐ शिवाय नमः | ॐ शुद्धाय नमः |

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  • आरती संग्रह

श्री गणेश अष्टोतर नामावलि

॥ श्री गणेश अष्टोतर नामावलि ॥ ॐ अकल्मषाय नमः । ॐ अग्निगर्भच्चिदे नमः । ॐ अग्रण्ये नमः । ॐ अजाय नमः । ॐ अद्भुतमूर्तिमते नमः । ॐ अध्यक्क्षाय नमः । ॐ अनेकाचिताय नमः । ॐ अव्यक्तमूर्तये नमः । ॐ अव्ययाय नमः । ॐ अव्ययाय नमः । ॐ आश्रिताय नमः । ॐ इन्द्रश्रीप्रदाय नमः । ॐ इक्षुचापधृते नमः । ॐ उत्पलकराय नमः । ॐ एकदन्ताय नमः । ॐ कलिकल्मषनाशनाय नमः । ॐ कान्ताय नमः । ॐ कामिने नमः । ॐ कालाय नमः । ॐ कुलाद्रिभेत्त्रे नमः । ॐ कृतिने नमः । ॐ कैवल्यशुखदाय नमः । ॐ गज

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