मंत्र

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  • आरती संग्रह

गणपति अथर्वशीर्ष

ॐ नमस्ते गणपतये।

त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि।।

त्वमेव केवलं कर्त्ताऽसि।

त्वमेव केवलं धर्तासि।।

त्वमेव केवलं हर्ताऽसि।

त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।।

त्वं साक्षादत्मासि नित्यम्।

ऋतं वच्मि।। सत्यं वच्मि।।

अव त्वं मां।। अव वक्तारं।।

अव श्रोतारं। अवदातारं।।

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श्री गणेश पंच रत्न स्तोत्र

मुदा करात्त मोदकं सदा विमुक्ति साधकम् । कलाधरावतंसकं विलासिलोक रक्षकम् । अनायकैक नायकं विनाशितेभ दैत्यकम् । नताशुभाशु नाशकं नमामि तं विनायकम् ॥ 1 ॥

नतेतराति भीकरं नवोदितार्क भास्वरम् । नमत्सुरारि निर्जरं नत

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वक्र तुंड महाकाय, सूर्य कोटि समप्रभ:। निर्विघ्नं कुरु मे देव शुभ कार्येषु सर्वदा ॥

भावार्थ : हे हाथी के जैसे विशालकाय जिसका तेज सूर्य की सहस्त्र किरणों के समान हैं । बिना विघ्न के मेरा कार्य पूर्ण हो और सदा ही मेरे लिए शुभ हो ऐसी कामना करते है ।

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  • आरती संग्रह

नमामि देवं सकलार्थदं तं सुवर्णवर्णं भुजगोपवीतम्ं। गजाननं भास्करमेकदन्तं लम्बोदरं वारिभावसनं च॥

भावार्थ : मैं उन भगवान् गजानन की वन्दना करता हूँ, जो समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाले हैं, सुवर्ण तथा सूर्य के समान देदीप्यमान कान्ति से चमक रहे हैं, सर्पका यज्ञोपवीत धारण करते हैं, एकदन्त हैं, लम्बोदर हैं तथा कमल के आसनपर विराजमान हैं ।

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एकदन्तं महाकायं लम्बोदरगजाननम्ं। विध्ननाशकरं देवं हेरम्बं प्रणमाम्यहम्॥

भावार्थ : जो एक दाँत से सुशोभित हैं, विशाल शरीरवाले हैं, लम्बोदर हैं, गजानन हैं तथा जो विघ्नोंके विनाशकर्ता हैं, मैं उन दिव्य भगवान् हेरम्बको प्रणाम करता हूँ ।

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विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धितायं। नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥

भावार्थ : विघ्नेश्वर, वर देनेवाले, देवताओं को प्रिय, लम्बोदर, कलाओंसे परिपूर्ण, जगत् का हित करनेवाले, गजके समान मुखवाले और वेद तथा यज्ञ से विभूषित पार्वतीपुत्र को नमस्कार है ; हे गणनाथ ! आपको नमस्कार है ।

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  • आरती संग्रह

द्वविमौ ग्रसते भूमिः सर्पो बिलशयानिवं। राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम्॥

भावार्थ : जिस प्रकार बिल में रहने वाले मेढक, चूहे आदि जीवों को सर्प खा जाता है, उसी प्रकार शत्रु का विरोध न करने वाले राजा और परदेस गमन से डरने वाले ब्राह्मण को यह समय खा जाता है ।

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  • आरती संग्रह

गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारु भक्षणम्ं। उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्॥

भावार्थ : जो हाथी के समान मुख वाले हैं, भूतगणादिसे सदा सेवित रहते हैं, कैथ तथा जामुन फल जिनके लिए प्रिय भोज्य हैं, पार्वती के पुत्र हैं तथा जो प्राणियों के शोक का विनाश करनेवाले हैं, उन विघ्नेश्वर के चरणकमलों में नमस्कार करता हुँ।

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  • आरती संग्रह

रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष रक्ष त्रैलोक्यरक्षकं। भक्तानामभयं कर्ता त्राता भव भवार्णवात्॥

भावार्थ : हे गणाध्यक्ष रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिये । हे तीनों लोकों के रक्षक! रक्षा कीजिए; आप भक्तों को अभय प्रदान करनेवाले हैं, भवसागर से मेरी रक्षा कीजिये ।

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केयूरिणं हारकिरीटजुष्टं चतुर्भुजं पाशवराभयानिं। सृणिं वहन्तं गणपं त्रिनेत्रं सचामरस्त्रीयुगलेन युक्तम्॥

भावार्थ : मैं उन भगवान् गणपतिकी वन्दना करता हूँ जो केयूर-हार-किरीट आदि आभूषणों से सुसज्जित हैं, चतुर्भुज हैं और अपने चार हाथों में पाशा अंकुश-वर और अभय मुद्रा को धारण करते हैं, जो तीन नेत्रों वाले हैं, जिन्हें दो स्त्रियाँ चँवर डुलाती रहती हैं ।

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मंत्र पुष्पांजली

ॐ यज्ञेन यज्ञमयजंत देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्| ते हं नाकं महिमान: सचंत यत्र पूर्वे साध्या: संति देवा: ॐ राजाधिराजाय प्रसह्ये साहिने| नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे स मे कामान्कामकामाय मह्यम्| कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु| कुबेराय वैश्रवणाय | महाराजाय नम: ॐ स्वस्ति साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं पारमेष्ठ्यं राज्यं माहाराज्यमाधिपत्यमयं समंतपर्यायी स्यात्सार्वभौम: सार्वायुष आंतादापरार्धात्पृथिव्यै समुद्रपर्यंता या एकराळिति तदप्येष श्लोकोऽभिगीतो मरुत: परिवेष्टार

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द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम्

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥ परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्। सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥ वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे। हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥ एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः। सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥ एतेशां दर्शनादेव पातकं नैव तिष्ठति। कर्मक्षयो भवेत्तस्य यस्य तुष्टो महेश्वराः॥:

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लिंगाष्टकम

ब्रह्ममुरारिसुरार्चित लिगं निर्मलभाषितशोभित लिंग | जन्मजदुःखविनाशक लिंग तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥१ मैं उन सदाशिव लिंग को प्रणाम करता हूँ जिनकी ब्रह्मा, विष्णु एवं देवताओं द्वारा अर्चना की जाती है, जो सदैव निर्मल भाषाओं द्वारा पूजित हैं तथा जो लिंग जन्म-मृत्यू के चक्र का विनाश करता है (मोक्ष प्रदान करता है) देवमुनिप्रवरार्चित लिंगं, कामदहं करुणाकर लिंगं| रावणदर्पविनाशन लिंगं तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥२ देवताओं और मुनियों द्वारा पूजित लिंग, जो काम का दमन करता है तथा करूणामयं शिव का

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शिव गायत्री मंत्र

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे। महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात।।

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श्री अर्द्धनारीश्वर स्तोत्र

चाम्बेये गौरार्थ शरीराकायै कर्पूर गौरार्थ शरीरकाय तम्मिल्लकायै च जटाधराय नमः शिवायै च नमः शिवाय . चपंगी फूल सा हरित पार्वतिदेविको अपने अर्द्ध शरीर को जिसने दिया है कर्पूर रंग -सा जटाधारी शिव को मेरा नमस्कार. कस्तूरिका कुंकुम चर्चितायै चितारजः पुंज विचर्चिताय कृतस्मारायै विकृतस्मराय नमः शिवायै च नमः शिवाय . कस्तूरी -कुंकुम धारण कर अति सुन्दर लगनेवाली पार्वती देवी को जिसने अपने अर्द्ध देह दिया हैं,उस शिव को नमस्कार.अपने सम्पूर्ण शरीर पर विभूति मलकर दर्शन देनेवाले शिव

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रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र

॥ अथ रावण कृत शिव तांडव स्तोत्र ॥ जटाटवीग लज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌। डमड्डमड्डमड्डम न्निनादवड्डमर्वयं चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥ जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी । विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि । धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥ धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर- स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे । कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु

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श्री शिव पंचाक्षरस्तोत्रम

नागेंद्र्हराय त्रिलोचन भस्मांगरागाय महेश्वराय ! नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै 'न' काराय नमः शिवाय !! हे महेश्वर! आप नागराज को हार स्वरूप धारण करने वाले हैं। हे (तीन नेत्रों वाले) त्रिलोचन आप भष्म से अलंकृत, नित्य (अनादि एवं अनंत) एवं शुद्ध हैं। अम्बर को वस्त्र सामान धारण करने वाले दिग्म्बर शिव, आपके न् अक्षर द्वारा जाने वाले स्वरूप को नमस्कार । मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय ! मंदारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै 'म' काराय नमः शिवाय !! चन्दन से अलंकृत,

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चन्द्रशेखराष्टकं

॥ अथ चन्द्रशेखराष्टकम् ॥ चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर पाहिमाम् । चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ १॥ रत्नसानुशरासनं रजतादिशृङ्गनिकेतनं सिञ्जिनीकृतपन्नगेश्वरमच्युताननसायकम् । क्षिप्रदघपुरत्रयं त्रिदिवालयैभिवन्दितं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ २॥ पञ्चपादपपुष्पगन्धपदाम्बुजदूयशोभितं भाललोचनजातपावकदग्धमन्मथविग्रह।म् । भस्मदिग्धकलेवरं भवनाशनं भवमव्ययं चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ३॥ मत्त्वारणमुख्यचर्मकृतोत्तरीमनोहरं पङ्कजा

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दारिद्र्य दहन शिवस्तोत्रं

|| दारिद्र्य दहन शिवस्तोत्रं || विश्वेश्वराय नरकार्णव तारणाय कणामृताय शशिशेखरधारणाय | कर्पूरकान्तिधवलाय जटाधराय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || १|| गौरीप्रियाय रजनीशकलाधराय कालान्तकाय भुजगाधिपकङ्कणाय | गंगाधराय गजराजविमर्दनाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || २|| भक्तिप्रियाय भवरोगभयापहाय उग्राय दुर्गभवसागरतारणाय | ज्योतिर्मयाय गुणनामसुनृत्यकाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || ३|| चर्मम्बराय शवभस्मविलेपनाय भालेक्षणाय मणिकुण्डलमण्डिताय | मंझीरपादयुगलाय जटाधराय दारिद

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श्री वैद्यनाथाष्टकम्

|| वैद्यनाथाष्टकम्|| श्रीरामसौमित्रिजटायुवेद षडाननादित्य कुजार्चिताय | श्रीनीलकण्ठाय दयामयाय श्रीवैद्यनाथाय नमःशिवाय || १|| शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव | शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव || गङ्गाप्रवाहेन्दु जटाधराय त्रिलोचनाय स्मर कालहन्त्रे | समस्त देवैरभिपूजिताय श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय || २|| शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव | शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव || भक्तःप्रियाय त्रिपुरान्तकाय पिनाक

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श्रीविश्वनाथाष्टकं

|| विश्वनाथाष्टकम् || गङ्गातरंगरमणीयजटाकलापं गौरीनिरन्तरविभूषितवामभागम् | नारायणप्रियमनंगमदापहारं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् || वाचामगोचरमनेकगुणस्वरूपं वागीशविष्णुसुरसेवितपादपीठम् | वामेनविग्रहवरेणकलत्रवन्तं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् || भूताधिपं भुजगभूषणभूषितांगं व्याघ्राजिनांबरधरं जटिलं त्रिनेत्रम् | पाशांकुशाभयवरप्रदशूलपाणिं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् | शीतांशुशोभितकिरीटविराजमानं भालेक्षणानलविशोषितपंचबाणम् | नागाधिपारचितभासुरकर्णपूरं वाराणसीपुरपतिं भज

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शिवाष्टकं

॥ अथ श्री शिवाष्टकं ॥ प्रभुं प्राणनाथं विभुं विश्वनाथं जगन्नाथनाथं सदानन्दभाजाम् । भवद्भव्यभूतेश्वरं भूतनाथं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ १॥ गले रुण्डमालं तनौ सर्पजालं महाकालकालं गणेशाधिपालम् । जटाजूटभङ्गोत्तरङ्गैर्विशालं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ २॥ मुदामाकरं मण्डनं मण्डयन्तं महामण्डल भस्मभूषधरंतम् । अनादिह्यपारं महामोहहारं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ३॥ तटाधो निवासं महाट्टाट्टहासं महापापनाशं सदासुप्रकाशम् । गिरीशं गणेशं महेशं सुरेशं शिवं शङ्करं शम्भुमीश

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श्रीरुद्राष्टकम्

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपं। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजे हं॥1॥ निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं। करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतो हं॥2॥ तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं। स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥3॥ चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालं। मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥4॥

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अच्युताष्टकं

अच्युतं केशवं स्वामिनारायणम् कृष्णदामोदरम् वासुदेवम् हरिम्। श्रीधरं माधवं गोपीकावल्ल्भं जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे ॥१॥ अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम्। इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं देवकीनंदनं नंदजं संदधे ॥२॥ विष्णवे जिष्णवे शंखिने चक्रिणे रुक्मिणीरागिणे जानकीजानये। बल्लवीवल्लभायाऽर्चितायात्मने कंसविध्वंसिने वंशिने ते नम: ॥३॥ कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे। अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षज द्वारकानायक द्रोपदीरक्षक ॥४॥ राक्षसक्ष

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॥ श्रीरामरक्षास्तोत्रम् ॥

॥ श्रीरामरक्षास्तोत्रम् ॥

श्रीगणेशायनम: ।

अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य ।

बुधकौशिक ऋषि: ।

श्रीसीतारामचंद्रोदेवता ।

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श्री राधाकृष्ण सहस्त्रनाम स्तोत्रम्

श्रीराधाकृष्णसहस्त्रनामस्तोत्रम् ध्यानम् स्वभावतोऽपास्तसमस्तदोष – मशेषकल्याणगुणैकराशिम् । व्यूहाङ्गिनं ब्रह्म परं वरेण्यं ध्यायेम कृष्णं कमलेक्षणं हरिम् ॥ अङ्गे तु वामे वृषभानुजां मुदा विराजमानामनुरूपसौभगाम् । सखीसहस्त्रैः परिसेवितां सदा स्मरेम देवीं सकलेष्टकामदाम् ॥ सनत्कुमार उवाच ततस्त्त्वं नारद पुनः पृष्टवान् वै सदाशिवम् । नाम्नां सहस्त्रं तच्चापि प्रोक्तवांस्तच्छृणुष्व मे । ध्यात्वा वृन्दावने रम्ये यमुनातीरसंगतम् ॥ कल्पवृक्षं समाश्रित्य तिष्ठन्तं राधिकायुतम् ।

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श्री गोपाल सहस्त्रनामस्तोत्रम्

श्री पार्वती उवाच कैलासशिखरे रम्ये गौरी पृच्छति शंकरम् । ब्रह्माण्डखिलनाथस्त्वं सृष्टिसंहारकारकः ॥१॥ त्वमेव पूज्यसे लोकैर्ब्रह्मविष्णुसुरादिभिः । नित्यं पठसि देवेश कस्य स्तोत्रं महेश्वर ॥२॥ आश्चर्यमिदमत्यन्तं जायते मम शंकर । तत्प्राणेश महाप्राज्ञ संशयं छिन्धि शंकर ॥३॥ श्री महादेव उवाच धन्यासि कृतपुण्यासि पार्वति प्राणवल्लभे । रहस्यातिरहस्यं च यत्पृच्छसि वरानने ॥४॥ स्त्रीस्वभावान्महादेवि पुनस्त्वं परिपृच्छसि । गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नतः ॥५॥ दत्ते च सिद्धिहा

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श्री बजरंग बाण

दोहा- निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान। तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥ चौपाई- जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥१।। जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥२।। जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥३।। आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥४।। जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥५।। बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥६।। अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥७।।

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श्री हनुमत स्तवन

सोरठा : प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ज्ञानघन | जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर ||१|| अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहम् | दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ||२|| सकलगुणनिधानं वानराणामधीशम् | रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ||३|| गोष्पदीकृतवारीशं मशकीकृतराक्षसम् | रामायणमहामालारत्नं वन्देऽनिलात्मजम् ||४|| अञ्जनानन्दनं वीरं जानकीशोकनाशनम् | कपीशमक्षहन्तारं वन्दे लङ्काभयङ्करम् ||५|| महाव्याकरणाम्भोधिमन्थमानसमन्दरम् | कवयन्तं रामकीर्त्या हनुमन्तमुपास्मह

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श्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशत नामावलि (महा लक्ष्मी के १०८ नाम)

ॐ प्रकृत्यै नमः ।१। ॐ विकृत्यै नमः ।२। ॐ विद्यायै नमः ।३। ॐ सर्वभूतहितप्रदायै नमः ।४। ॐ श्रद्धायै नमः ।५। ॐ विभूत्यै नमः ।६। ॐ सुरभ्यै नमः ।७। ॐ परमात्मिकायै नमः ।८। ॐ वाचे नमः ।९। ॐ पद्मालयायै नमः ।१०। ॐ पद्मायै नमः ।११। ॐ शुचये नमः ।१२। ॐ स्वाहायै नमः ।१३। ॐ स्वधायै नमः ।१४। ॐ सुधायै नमः ।१५। ॐ धन्यायै नमः ।१६। ॐ हिरण्मय्यै नमः ।१७। ॐ लक्ष्म्यै नमः ।१८। ॐ नित्यपुष्टायै नमः ।१९। ॐ विभावर्यै नमः ।२०। ॐ अदित्यै नमः ।२१। ॐ दित्ये नमः ।२२। ॐ दीपायै नमः ।

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देवकृत लक्ष्मी स्तोत्रम्

|| देवकृत लक्ष्मी स्तोत्रम् || क्षमस्व भगवंत्यव क्षमाशीले परात्परे | शुद्धसत्त्वस्वरूपे च कोपादिपरिवर्जिते || उपमे सर्वसाध्वीनां देवीनां देवपूजिते | त्वया विना जगत्सर्वं मृततुल्यं च निष्फलम् || सर्वसंपत्स्वरूपा त्वं सर्वेषां सर्वरूपिणी | रासेश्वर्यधि देवी त्वं त्वत्कलाः सर्वयोषितः || कैलासे पार्वती त्वं च क्षीरोदे सिन्धुकन्यका | स्वर्गे च स्वर्गलक्ष्मीस्त्वं मर्त्यलक्ष्मीश्च भूतले || वैकुंठे च महालक्ष्मीर्देवदेवी सरस्वती | गंगा च तुलसी त्वं च सावित्री ब्रह्मालोकतः ||

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श्रीलक्ष्मीस्तव

॥ श्रीलक्ष्मीस्तव ॥ नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते । शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तुते ॥ १॥ इन्द्र बोले- श्रीपीठपर स्थित और देवताओं से पूजित होने वाली हे महामाये। तुम्हें नमस्कार है। हाथ में शङ्ख, चक्र और गदा धारण करने वाली हे महालक्ष्मी! तुम्हें प्रणाम है॥1॥ नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयङ्करि । सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तुते ॥ २॥ गरुडपर आरूढ हो कोलासुर को भय देने वाली और समस्त पापों को हरने वाली हे भगवति महालक्ष्मी! तुम्हें प्रणाम है॥2॥

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लक्ष्मी नृसिंह स्तोत्रम्

श्रीमत्पयोनिधिनिकेतन चक्रपाणे भोगीन्द्रभोगमणिरंजितपुण्यमूर्ते। योगीश शाश्वतशरण्यभवाब्धिपोतलक्ष्मीनृसिंहममदेहिकरावलम्बम॥1॥ ब्रम्हेन्द्र-रुद्र-मरुदर्क-किरीट-कोटि-संघट्टितांघ्रि-कमलामलकान्तिकान्त। लक्ष्मीलसत्कुचसरोरुहराजहंस लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्॥2॥ संसारघोरगहने चरतो मुरारे मारोग्र-भीकर-मृगप्रवरार्दितस्य। आर्तस्य मत्सर-निदाघ-निपीडितस्यलक्ष्मीनृसिंहममदेहिकरावलम्बम्॥3॥ संसारकूप-मतिघोरमगाधमूलं सम्प्राप्य दुःखशत-सर्पसमाकुलस्य। दीनस्य देव कृपणापदमागतस्य लक्ष्मीनृसिंह मम

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।।श्री लक्ष्मी नृसिंह सर्वसिद्धिकर ऋणमोचन स्तोत्र।।

देवकार्य सिध्यर्थं सभस्तंभं समुद् भवम। श्री नृसिंह महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ।।1।। लक्ष्म्यालिन्गितं वामांगं, भक्ताम्ना वरदायकं। श्री नृसिंह महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ।।2।। अन्त्रांलादरं शंखं, गदाचक्रयुध धरम्। श्री नृसिंह महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ।।3।। स्मरणात् सर्व पापघ्नं वरदं मनोवाञ्छितं। श्री नृसिंह महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ।।4।। सिहंनादेनाहतं, दारिद्र्यं बंद मोचनं। श्री नृसिंह महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ।।5।। प्रल्हाद वरदं श्रीशं, धनः कोषः परिपुर्तये। श्री नृसिं

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श्री विष्णु सहस्त्रनामस्तोत्र

श्री विष्णु सहस्त्रनामस्तोत्र ध्यान शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥ सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम् । सहारवक्षः स्थलकौस्तुभश्रियं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम् ॥

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अच्युताष्टकं

अच्युतं केशवं स्वामिनारायणम् कृष्णदामोदरम् वासुदेवम् हरिम्।
श्रीधरं माधवं गोपीकावल्ल्भं जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे ॥१॥

अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम्।
इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं देवकीनंदनं नंदजं संदधे ॥२॥

विष्णवे जिष्णवे शंखिने चक्रिणे रुक्मिणीरागिणे जानकीजानये।
बल्लवीवल्लभायाऽर्चितायात्मने कंसविध्वंसिने वंशिने ते नम: ॥३॥

कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे।
अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षज द्वारकानायक द

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श्री सिद्धि विनायक नामावलि

||श्री सिद्धि विनायक नामावलि || ॐ विनायकाय नमः | ॐ विघ्नराजाय नमः | ॐ गौरीपुत्राय नमः | ॐ गणेश्वराय नमः | ॐ स्कन्दाग्रजाय नमः | ॐ अव्ययाय नमः | ॐ पूताय नमः | ॐ दक्षाध्यक्ष्याय नमः | ॐ द्विजप्रियाय नमः | ॐ अग्निगर्भच्छिदे नमः | ॐ इंद्रश्रीप्रदाय नमः | ॐ वाणीबलप्रदाय नमः | ॐ सर्वसिद्धिप्रदायकाय नमः | ॐ शर्वतनयाय नमः | ॐ गौरीतनूजाय नमः | ॐ शर्वरीप्रियाय नमः | ॐ सर्वात्मकाय नमः | ॐ सृष्टिकर्त्रे नमः | ॐ देवानीकार्चिताय नमः | ॐ शिवाय नमः | ॐ शुद्धाय नमः |

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श्री गणेश अष्टोतर नामावलि

॥ श्री गणेश अष्टोतर नामावलि ॥ ॐ अकल्मषाय नमः । ॐ अग्निगर्भच्चिदे नमः । ॐ अग्रण्ये नमः । ॐ अजाय नमः । ॐ अद्भुतमूर्तिमते नमः । ॐ अध्यक्क्षाय नमः । ॐ अनेकाचिताय नमः । ॐ अव्यक्तमूर्तये नमः । ॐ अव्ययाय नमः । ॐ अव्ययाय नमः । ॐ आश्रिताय नमः । ॐ इन्द्रश्रीप्रदाय नमः । ॐ इक्षुचापधृते नमः । ॐ उत्पलकराय नमः । ॐ एकदन्ताय नमः । ॐ कलिकल्मषनाशनाय नमः । ॐ कान्ताय नमः । ॐ कामिने नमः । ॐ कालाय नमः । ॐ कुलाद्रिभेत्त्रे नमः । ॐ कृतिने नमः । ॐ कैवल्यशुखदाय नमः । ॐ गज

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भैरव स्तुति

भैरव स्तुति ॐ जै-जै भैरवबाबा स्वामी जै भैरवबाबा। नमो विश्व भूतेश भुजंगी मंजुल कहलावा उमानंद अमरेश विमोचन जनपद सिरनावा। काशी के कृतवाल आपको सकल जगत ध्यावा। स्वान सवारी बटुकनाथ प्रभु पी मद हर्षावा। ॐ।। रवि के दिन जग भोग लगावे मोदक मन भावा। भीषण भीम कृपालु त्रिलोचन खप्पर भर खावा। शेखरचंद्र कृपालु शशि प्रभु मस्तक चमकावा। गल मुण्डन की माला सुशोभित सुन्दर दरसावा। ॐ।। नमो-नमो आनंद कंद प्रभु लट गत मठ झावा। कर्ष तुण्ड शिव कपिल त्रयम्बक यश जग में छावा। जो जन तुमसे लगावत संकट न

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श्री कालभैरवाष्टकं

॥ श्री कालभैरवाष्टकं ॥ देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम् । नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगंबरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ १॥ भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम् । कालकालमंबुजाक्षमक्षशूलमक्षरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ २॥ शूलटंकपाशदण्डपाणिमादिकारणं श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम् । भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ३॥ भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं भक्तवत्सलं स्थितं समस्त

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|| शनैश्चरस्तवराजः ||

|| शनैश्चरस्तवराजः || नारद उवाच ध्यात्वा गणपतिं राजा धर्मराजो युधिष्ठिरः | धीरः शनैश्चरस्येमं चकार स्तवमुत्तमम || १|| शिरो में भास्करिः पातु भालं छायासुतोऽवतु | कोटराक्षो दृशौ पातु शिखिकण्ठनिभः श्रुती || २|| घ्राणं मे भीषणः पातु मुखं बलिमुखोऽवतु | स्कन्धौ संवर्तकः पातु भुजौ मे भयदोऽवतु || ३|| सौरिर्मे हृदयं पातु नाभिं शनैश्चरोऽवतु | ग्रहराजः कटिं पातु सर्वतो रविनन्दनः || ४|| पादौ मन्दगतिः पातु कृष्णः पात्वखिलं वपुः | रक्षामेतां पठेन्नित्यं सौरेर्नामबलैर

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॥ शनैश्चरस्तोत्रम् ॥

॥ श्रीशनैश्चरस्तोत्रम् ॥ अस्य श्रीशनैश्चरस्तोत्रस्य दशरथ ऋषिः । शनैश्चरो देवता । त्रिष्टुप् छन्दः । । शनैश्चरप्रीत्यर्थ जपे विनियोगः। दशरथ उवाच – कोणोऽण्तको रौद्रयमोऽथ बभ्रुः कृष्णः शनिः पिंगलमन्दोसौरिः । नित्यं स्मृतो यो हरते च पीडां तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ १॥ सुरासुराः किंपुरुषोरगेन्द्रा गन्धर्वविद्याधरपन्नगाश्च । पीड्यन्ति सर्वे विषमश्थितेन तस्मैइ नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ २॥ नरा नरेन्द्राः पशवो मृगेन्द्रा वन्याश्च ये कीटपतंगभृङ्गाः । पीड्यन्ति सर्वे विषमश्थितेन तस्मैइ

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दशरथकृत शनि स्तोत्र

दशरथकृत शनि स्तोत्र विनियोगः- ॐ अस्य श्रीशनि-स्तोत्र-मन्त्रस्य कश्यप ऋषिः, त्रिष्टुप् छन्दः, सौरिर्देवता, शं बीजम्, निः शक्तिः, कृष्णवर्णेति कीलकम्, धर्मार्थ-काम-मोक्षात्मक-चतुर्विध-पुरुषार्थ-सिद्धयर्थे जपे विनियोगः। कर-न्यासः- शनैश्चराय अंगुष्ठाभ्यां नमः। मन्दगतये तर्जनीभ्यां नमः। अधोक्षजाय मध्यमाभ्यां नमः। कृष्णांगाय अनामिकाभ्यां नमः। शुष्कोदराय कनिष्ठिकाभ्यां नमः। छायात्मजाय करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः। हृदयादि-न्यासः- शनैश्चराय हृदयाय नमः। मन्दगतये शिरसे स्वाहा। अधोक्षजा

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शनि अष्टोत्तरशतनामावलिः

शनि बीज मन्त्र ॐ प्राँ प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः ॥ ॐ शनैश्चराय नमः ॥ ॐ शान्ताय नमः ॥ ॐ सर्वाभीष्टप्रदायिने नमः ॥ ॐ शरण्याय नमः ॥ ॐ वरेण्याय नमः ॥ ॐ सर्वेशाय नमः ॥ ॐ सौम्याय नमः ॥ ॐ सुरवन्द्याय नमः ॥ ॐ सुरलोकविहारिणे नमः ॥ ॐ सुखासनोपविष्टाय नमः ॥ ॐ सुन्दराय नमः ॥ ॐ घनाय नमः ॥ ॐ घनरूपाय नमः ॥ ॐ घनाभरणधारिणे नमः ॥ ॐ घनसारविलेपाय नमः ॥ ॐ खद्योताय नमः ॥ ॐ मन्दाय नमः ॥ ॐ मन्दचेष्टाय नमः ॥ ॐ महनीयगुणात्मने नमः ॥ ॐ मर्त्यपावनपदाय नमः ॥ ॐ महेशाय नमः ॥ ॐ

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श्री दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा

श्री दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा

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श्री साईं बाबा अष्टोत्तारशत - नामावली

ॐ श्री साईंनाथाय नमः --- ॐ श्री साईंनाथ को नमस्कार ॐ श्री साईं लक्ष्मी नारायणाय नमः --- ॐ जो लक्ष्मी नारायण के स्वरुप हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार ॐ श्री साईं कृष्णमशिवमारूतयादिरूपाय नमः --- ॐ जो श्री कृष्ण, राम, शिव, मारुति आदि देवताओं के स्वरुप हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार ॐ श्री साईं शेषशायिने नमः --- ॐ जो शेषनाग पर शयन करने वाले भगवान विष्णु के अवतार हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार ॐ श्री साईं गोदावीरतटीशीलाधीवासिने नमः --- ॐ जो गोदावरी नदी के तट पर बसी "शीलधी" (शिरडी) में न

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शैलपुत्री की स्तोत्र पाठ

प्रथम दुर्गा त्वंहिभवसागर: तारणीम्। धन ऐश्वर्यदायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥ त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्। सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥ चराचरेश्वरी त्वंहिमहामोह: विनाशिन। मुक्तिभुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥

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शैलपुत्री की ध्यान

वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रर्धकृत शेखराम्। वृशारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्वनीम्॥ पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥ पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥ प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्। कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥

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ब्रह्मचारिणी मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू। देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

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ब्रह्मचारिणी ध्यान

वन्दे वांछित लाभायचन्द्रार्घकृतशेखराम्। जपमालाकमण्डलु धराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥ गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम। धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥ परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन। पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

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ब्रह्मचारिणी स्तोत्र पाठ

तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्। ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥ शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी। शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणीप्रणमाम्यहम्॥

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चन्द्रघंटा मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते महयं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।।

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चन्द्रघंटा की ध्यान

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्। सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥ मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्। खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥ पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्। मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥ प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्। कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥

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चन्द्रघंटा की स्तोत्र पाठ

आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्। अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम्॥ चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टं मन्त्र स्वरूपणीम्। धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम्॥ नानारूपधारिणी इच्छानयी ऐश्वर्यदायनीम्। सौभाग्यारोग्यदायिनी चंद्रघंटप्रणमाभ्यहम्॥

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कुष्मांडा मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

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माँ कूष्मांडा का उपासना मंत्र

कुत्सित: कूष्मा कूष्मा-त्रिविधतापयुत: संसार:, स अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां यस्या: सा कूष्मांडा

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कुष्मांडा की ध्यान

वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥ भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्। कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥ पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्। मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥ प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्। कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

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श्रीं महालक्ष्मी मंत्र

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालेय प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नम :

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स्कन्दमाता मंत्र

सिंहासना गता नित्यं पद्माश्रि तकरद्वया । शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ।। या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

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स्कन्दमाता की ध्यान

वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्। सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्वनीम्।। धवलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्। अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥ पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम्। मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम्॥ प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम्। कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम्॥

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स्कन्दमाता की स्तोत्र पाठ

नमामि स्कन्दमाता स्कन्दधारिणीम्। समग्रतत्वसागररमपारपार गहराम्॥ शिवाप्रभा समुज्वलां स्फुच्छशागशेखराम्। ललाटरत्नभास्करां जगत्प्रीन्तिभास्कराम्॥ महेन्द्रकश्यपार्चिता सनंतकुमाररसस्तुताम्। सुरासुरेन्द्रवन्दिता यथार्थनिर्मलादभुताम्॥ अतर्क्यरोचिरूविजां विकार दोषवर्जिताम्। मुमुक्षुभिर्विचिन्तता विशेषतत्वमुचिताम्॥ नानालंकार भूषितां मृगेन्द्रवाहनाग्रजाम्। सुशुध्दतत्वतोषणां त्रिवेन्दमारभुषताम्॥ सुधार्मिकौपकारिणी सुरेन्द्रकौरिघातिनीम्। शुभां पुष्पमालिनी सुकर्णकल्पशाखिनीम्॥ तमोन्धक

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देवी कात्यायनी के मंत्र

चन्द्रहासोज्जवलकरा शाईलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।। या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

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माता कात्यायनी की ध्यान

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम्॥ स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्। वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥ पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालंकार भूषिताम्। मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥ प्रसन्नवदना पञ्वाधरां कांतकपोला तुंग कुचाम्। कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम॥

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माता कात्यायनी की स्तोत्र पाठ

कंचनाभा वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां। स्मेरमुखीं शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोअस्तुते॥ पटाम्बर परिधानां नानालंकार भूषितां। सिंहस्थितां पदमहस्तां कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥ परमांवदमयी देवि परब्रह्म परमात्मा। परमशक्ति, परमभक्ति,कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥

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देवी कालरात्रि के मंत्र

1- या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

2- एक वेधी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता। लम्बोष्ठी कर्णिकाकणी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।। वामपदोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा। वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी।।

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देवी कालरात्रि के ध्यान

करालवंदना धोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्। कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युतमाला विभूषिताम॥ दिव्यं लौहवज्र खड्ग वामोघोर्ध्व कराम्बुजाम्। अभयं वरदां चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम॥ महामेघ प्रभां श्यामां तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा। घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥ सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम्। एवं सचियन्तयेत् कालरात्रिं सर्वकाम् समृध्दिदाम्॥

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देवी कालरात्रि स्तोत्र पाठ

हीं कालरात्रि श्री कराली च क्लीं कल्याणी कलावती। कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता॥ कामबीजजपान्दा कमबीजस्वरूपिणी। कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी॥ क्लीं हीं श्रीं मन्त्र्वर्णेन कालकण्टकघातिनी। कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा॥

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महागौरी के मंत्र

1- श्वेते वृषे समरूढा श्वेताम्बराधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।

2- या देवी सर्वभू‍तेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

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माता महागौरी की ध्यान

वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा महागौरी यशस्वनीम्॥ पूर्णन्दु निभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम्। वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥ पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्। मंजीर, हार, केयूर किंकिणी रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥ प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वाधरां कातं कपोलां त्रैलोक्य मोहनम्। कमनीया लावण्यां मृणांल चंदनगंधलिप्ताम्॥

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महागौरी की स्तोत्र पाठ

सर्वसंकट हंत्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्। ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥ सुख शान्तिदात्री धन धान्य प्रदीयनीम्। डमरूवाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥ त्रैलोक्यमंगल त्वंहि तापत्रय हारिणीम्। वददं चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥

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सिद्धिदात्री के मंत्र

सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि | सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ||

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सिद्धिदात्री के ध्यान

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्। कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम्॥ स्वर्णावर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्। शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिद्धीदात्री भजेम्॥ पटाम्बर, परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्। मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥ प्रफुल्ल वदना पल्लवाधरां कातं कपोला पीनपयोधराम्। कमनीयां लावण्यां श्रीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

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सिद्धिदात्री स्तोत्र पाठ

कंचनाभा शखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो। स्मेरमुखी शिवपत्नी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥ पटाम्बर परिधानां नानालंकारं भूषिता। नलिस्थितां नलनार्क्षी सिद्धीदात्री नमोअस्तुते॥ परमानंदमयी देवी परब्रह्म परमात्मा। परमशक्ति, परमभक्ति, सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥ विश्वकर्ती, विश्वभती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता। विश्व वार्चिता विश्वातीता सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥ भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी। भव सागर तारिणी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥ धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनी। मोक्षदायिनी सिद्

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नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्‌ | ॐ शं शनैश्चराय नमः |

नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्‌ | ॐ शं शनैश्चराय नमः |

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मंगला गौरी स्तोत्रं

ॐ रक्ष-रक्ष जगन्माते देवि मङ्गल चण्डिके । हारिके विपदार्राशे हर्षमंगल कारिके ॥ हर्षमंगल दक्षे च हर्षमंगल दायिके । शुभेमंगल दक्षे च शुभेमंगल चंडिके ॥ मंगले मंगलार्हे च सर्वमंगल मंगले । सता मंगल दे देवि सर्वेषां मंगलालये ॥ पूज्ये मंगलवारे च मंगलाभिष्ट देवते । पूज्ये मंगल भूपस्य मनुवंशस्य संततम् ॥ मंगला धिस्ठात देवि मंगलाञ्च मंगले। संसार मंगलाधारे पारे च सर्वकर्मणाम् ॥ देव्याश्च मंगलंस्तोत्रं यः श्रृणोति समाहितः। प्रति मंगलवारे च पूज्ये मंगल सुख-प्रदे ॥

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।। दुर्गासहस्रनामस्तोत्रम् ।।

।। अथ श्री दुर्गासहस्रनामस्तोत्रम् ।।  नारद उवाच -  कुमार गुणगम्भीर देवसेनापते प्रभो । सर्वाभीष्टप्रदं पुंसां सर्वपापप्रणाशनम् ।। १।। गुह्याद्गुह्यतरं स्तोत्रं भक्तिवर्धकमञ्जसा । मङ्गलं ग्रहपीडादिशान्तिदं वक्तुमर्हसि ।। २।। स्कन्द उवाच - शृणु नारद देवर्षे लोकानुग्रहकाम्यया । यत्पृच्छसि परं पुण्यं तत्ते वक्ष्यामि कौतुकात् ।। ३।। माता मे लोकजननी हिमवन्नगसत्तमात् । मेनायां ब्रह्मवादिन्यां प्रादुर्भूता हरप्रिया ।। ४।। महता तपसाऽऽराध्य

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आदौ राम तपोवनादि गमनं, हत्वा मृगं कांचनम्।

वैदीहीहरणं जटायुमरणं, सुग्रीवसंभाषणम्।।

बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं, लंकापुरीदाहनम्।

पश्चाद् रावण कुम्भकर्ण हननम्, एतद्धि रामायणम्।।

आदौ राम तपोवनादि गमनं, हत्वा मृगं कांचनम्। वैदीहीहरणं जटायुमरणं, सुग्रीवसंभाषणम्।। बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं, लंकापुरीदाहनम्। पश्चाद् रावण कुम्भकर्ण हननम्, एतद्धि रामायणम्।।

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देवी माहात्म्य

।। अष्टमोऽध्यायः ।। ॐ अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं धृतपाशाङ्कुशबाणचापहस्ताम्। अणिमादिभिरावृतां मयूखैरहमित्येव विभावये भवानीम्।। ‘ॐ’ ऋषिरुवाच ।। १।। चण्डे च निहते दैत्ये मुण्डे च विनिपातिते । बहुलेषु च सैन्येषु क्षयितेष्वसुरेश्वरः ।। २।। ततः कोपपराधीनचेताः शुम्भः प्रतापवान् । उद्योगं सर्वसैन्यानां दैत्यानामादिदेश ह ।। ३।। अद्य सर्वबलैर्दैत्याः षडशीतिरुदायुधाः । कम्बूनां चतुरशीतिर्निर्यान्तु स्वबलैर्वृताः ।। ४।। कोटिवीर्याणि पञ्चाशदसुराणां कुलानि वै ।

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श्री दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्

।। दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं ( विश्वसारतन्त्र ) ।। ईश्वर उवाच  शतनाम प्रवक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने । यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती ।। १।। ॐ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी । आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी ।। २।। पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपाः । मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरूपा चिता चितिः ।। ३।। सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्द स्वरूपिणी । अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः ।। ४।। शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्नप्रिया

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